महानगर का मोह टूट रहा है: भारत की अगली तरक्की छोटे शहरों के आंगन में लिखी जा रही है

Founder and CEO of Micro Mitti Manoj Dhanotiya
Manoj Dhanotiya Founder of Micro Mitti

Founder and CEO of Micro Mitti

भारत में छोटे शहरों की रियल एस्टेट ग्रोथ

CII और नाइट फ्रैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि घर, रोजगार और निवेश का नक्शा बदल रहा है। असली सवाल यह है कि क्या हमारे शहर इस मौके को संभालने के लिए तैयार हैं।

 

मनोज धनोतिया,संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, माइक्रोमिट्टी

3.7 करोड़ रुपये। मुंबई में 1,000 वर्ग फुट के एक साधारण फ्लैट की कीमत इतनी है। इतनी रकम में इंदौर में उतने ही बड़े साढ़े पांच घर आ जाते हैं। फिर भी पिछले तीन दशकों से हमारा समाज यही मानता रहा कि बड़ा सपना देखना है तो बड़े शहर जाना होगा। मेरी पीढ़ी ने एक दृश्य बार बार देखा है। इंदौर, भोपाल या किसी भी छोटे शहर के स्टेशन पर एक नौजवान पुणे, बेंगलुरु या गुड़गांव की ट्रेन में बैठता है, और प्लेटफॉर्म पर खड़े माता पिता मन ही मन मान लेते हैं कि अब बेटा या बेटी साल में एक दो बार ही घर आएगा। तरक्की का रास्ता महानगर से होकर जाता था। नौकरी वहां थी, पैसा वहां था, और इसलिए घर भी वहीं बनता था।
मैंने उलटा रास्ता चुना। मैं इंदौर में रहा और यहीं से अपना काम खड़ा किया। तब कई लोगों को यह फैसला जोखिम भरा लगा था। आज CII और नाइट फ्रैंक इंडिया की सितंबर 2026 की रिपोर्ट India’s Next Real Estate Markets पढ़ते हुए लगता है कि आंकड़े अब वही कह रहे हैं जो लाखों परिवार अपने अनुभव से समझ चुके हैं। मैंने इस रिपोर्ट को नाइट फ्रैंक की H1 2026 रिपोर्ट के साथ रखकर पढ़ा, जो आठ बड़े महानगरों का ताजा हाल बताती है। दोनों को साथ रखने पर जो तस्वीर उभरती है, वह हर उस परिवार के काम की है जो घर, बच्चों के भविष्य या अपनी बचत के बारे में सोच रहा है।

74 शहर, चार कसौटियां, 11 नाम

रिपोर्ट की सोच एक सीधे वाक्य पर टिकी है: आबादी आधार बनाती है, लेकिन बाजार आर्थिक गतिविधि से बनता है। नया एयरपोर्ट या हाईवे किसी शहर तक पहुंच आसान करता है, पर घरों की असली कीमत इस बात से तय होती है कि वहां नौकरियां, कारोबार और लोगों की कमाई कितनी है।

इसी सोच से नाइट फ्रैंक ने दस लाख से ज्यादा आबादी वाले देश के 74 शहरों को चार कसौटियों पर परखा। शहर बाकी देश से कितना जुड़ा है, उसकी अर्थव्यवस्था कितनी गहरी है, वहां भविष्य के लिए कितना निवेश हो रहा है, और वहां के लोग कितना खर्च कर पाते हैं। इस छलनी से 11 शहर निकले: चंडीगढ़ ट्राइसिटी, कोयंबटूर, जयपुर, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, नागपुर, भुवनेश्वर, विशाखापत्तनम, गोवा और कोच्चि। इनमें दो शहर मध्य प्रदेश के हैं।

आंकड़ों का पलटता खेल

2016 से 2026 के बीच इन 11 शहरों में घरों की कीमतें औसतन 8% सालाना की दर से बढ़ीं। देश के आठ बड़े महानगरों में यह दर 4% रही, यानी ठीक आधी। पिछले पांच साल में यह फासला और चौड़ा हुआ है। 2021 से 2026 के बीच इन शहरों में कीमतें 63% बढ़ीं, जबकि महानगरों में 42%।

एक आम परिवार के हिसाब से देखिए। 2021 में इन शहरों में 50 लाख रुपये का घर लेने वाले परिवार का घर आज औसतन करीब 81.5 लाख रुपये का होता। वही घर किसी औसत महानगर में करीब 71 लाख रुपये का होता। दस साल की रफ्तार से देखें तो एक करोड़ रुपये 8% की दर से करीब 2.16 करोड़ बनते हैं, और 4% की दर से सिर्फ 1.48 करोड़। बीच में 68 लाख रुपये का फर्क है।

पर यहां ईमानदारी जरूरी है। रिपोर्ट खुद मानती है कि प्रति वर्ग फुट के हिसाब से दस साल में बड़ी रकम की बढ़त अब भी महानगरों में हुई, क्योंकि वहां भाव पहले से बहुत ऊंचे थे। फर्क यह है कि आम परिवार के लिए असली सवाल हर लगाए गए रुपये पर बढ़त का होता है, और इस पैमाने पर छोटे शहर आगे निकल गए हैं।

महानगर की महंगी थकान

छोटे शहरों की ताकत समझने के लिए महानगरों की हालत देखना जरूरी है। नाइट फ्रैंक की H1 2026 रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी से जून के बीच आठ बड़े शहरों में 1,71,471 घर बिके, जो पिछले साल से सिर्फ 1% ज्यादा है। इसी दौरान बाजार में 1,87,350 नए घर आ गए। बिना बिके घरों का ढेर बढ़कर 5,25,695 पर पहुंच गया है।

इससे भी गहरी बात यह है कि महानगरों में बिके घरों में से 54% घर एक करोड़ रुपये से ऊपर के थे। 50 लाख से कम के घर लगभग बनने बंद हो गए हैं। नाइट फ्रैंक खुद मानता है कि मध्यम वर्ग के लिए वहां घर खरीदना आसान नहीं हुआ, क्योंकि कीमतें इतनी तेजी से बढ़ीं कि सस्ते होम लोन का फायदा भी उसमें खप गया।

यानी महानगर अब भी बड़े हैं, अमीर हैं, अवसरों से भरे हैं, लेकिन आम आदमी के लिए उनका दरवाजा संकरा होता जा रहा है। इंदौर में जो परिवार दफ्तर, स्कूल और अपने बुजुर्ग माता पिता, तीनों के पास घर ले सकता है, वही परिवार महानगर में शहर के किसी दूर कोने में छोटा फ्लैट लेकर रोज घंटों सड़क पर बिताता है। यह सिर्फ पैसे का नहीं, जिंदगी के समय का हिसाब है।

मॉल से ज्यादा बदली है मानसिकता

एक समय था जब छोटे शहर में रहने का मतलब समझौता था। अच्छे ब्रांड, अच्छे अस्पताल, अच्छी खरीदारी के लिए महानगर जाना पड़ता था। आज तस्वीर उलट रही है।

2020 के बाद टियर 2 शहरों में 59 लाख वर्ग फुट आधुनिक, ऊंची गुणवत्ता वाला रिटेल स्पेस जुड़ा, जबकि महानगरों में सिर्फ 19 लाख वर्ग फुट। तीन गुने से भी ज्यादा। छोटे शहरों के शॉपिंग सेंटरों में 61% जगह इसी ऊंची श्रेणी की है, महानगरों में 46%। यानी जो नया बन रहा है, वह कई मामलों में महानगरों से बेहतर बन रहा है। 24 प्रमुख टियर 2 शहरों में आज 37 देशों के 255 अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के 1,720 से ज्यादा स्टोर हैं।

जेब भी बदली है और आदतें भी। शहरी परिवार हर महीने प्रति व्यक्ति करीब 7,000 रुपये खर्च करते हैं, जो गांवों से करीब 70% ज्यादा है, और इसका 60% हिस्सा अब खाने पीने के अलावा शिक्षा, सेहत, सफर और मनोरंजन पर जाता है। देश के शहरी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 60 से 70% टियर 2 और टियर 3 शहरों में हैं।

घर को देखने का नजरिया भी बदला है। रिपोर्ट बताती है कि कोविड के बाद लोग बड़े घर, खुली जगह, सुरक्षा और अच्छी सुविधाओं वाली सोसाइटी चाहने लगे। घर से काम करने की सुविधा ने पेशेवरों को यह आजादी दी कि वे दफ्तर से दूर भी अपना शहर चुन सकें। रिपोर्ट के मुताबिक इन शहरों में घर खरीदने वालों में अब पेशेवर, कारोबारी, लौटकर आए प्रवासी और विदेश में बसे भारतीय भी हैं। मैंने इंदौर में यह खुद देखा है। जो परिवार कभी मौके की तलाश में बाहर गए थे, वे अब अपना करियर साथ लेकर लौट रहे हैं।

रिपोर्ट के आईने में इंदौर

रिपोर्ट में इंदौर का जिक्र कई जगह है, और हर जिक्र एक ही दिशा दिखाता है। उन शहरों की तालिका में, जहां कनेक्टिविटी सच में प्रॉपर्टी के अवसर में बदल रही है, इंदौर की तीन ताकतें गिनाई गई हैं: एयरपोर्ट, सुपर कॉरिडोर और औद्योगिक इलाकों से जुड़ाव। शहर की नींव सर्विस सेक्टर, शिक्षा और मैन्युफैक्चरिंग बताई गई है।

इंदौर में दस लाख वर्ग फुट से ज्यादा ऑफिस स्पेस है। विदेशी कंपनियों के अपने भारतीय दफ्तर, जिन्हें GCC कहा जाता है, यहां आने लगे हैं। इंदौर को उन उभरते शहरों में गिना गया है जहां कंपनियों को कुशल युवा मिलते हैं। वेयरहाउसिंग में भी यह उन छह शहरों में है जिन्होंने मिलकर प्रमुख टियर 2 शहरों की करीब आधी लीजिंग की।

रिपोर्ट ने इंदौर की तुलना रोमानिया के क्लूज नापोका से की है, जो राजधानी न होते हुए भी विश्वविद्यालयों, प्रतिभा और सर्विस सेक्टर के दम पर अपने देश के सबसे मजबूत शहरों में गिना जाता है। यह तुलना मुझे इसलिए सटीक लगती है क्योंकि यह इंदौर की असली पूंजी पहचानती है। हमारी पूंजी हमारे युवा, हमारे शिक्षण संस्थान और हमारा कारोबारी मिजाज है।

सड़कें रास्ता देती हैं, मंजिल रोजगार देता है

यह बदलाव अपने आप नहीं आया। इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का पूंजीगत खर्च FY15 में करीब 0.7 लाख करोड़ रुपये था, जो FY27 के बजट में 6.7 लाख करोड़ रुपये हो गया। 2014 से 2026 के बीच चालू एयरपोर्ट 74 से 165 हो गए, नेशनल हाईवे 60% बढ़े और मेट्रो 248 किलोमीटर से 1,155 किलोमीटर तक पहुंच गई। इंदौर और भोपाल दोनों में मेट्रो चल रही है या बन रही है।

लेकिन रिपोर्ट बार बार याद दिलाती है कि सड़क सिर्फ रास्ता खोलती है। शहर को आगे ले जाने का काम रोजगार करता है। छोटे और मझोले उद्योग देश की GDP में करीब 31%, कारखानों के उत्पादन में 35% और निर्यात में 49% योगदान देते हैं। देश के दो लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स में से करीब आधे टियर 2 और टियर 3 शहरों में हैं। ये आंकड़े सुर्खियां नहीं बनते, पर हर महीने की EMI इन्हीं से मिलने वाली तनख्वाह से भरी जाती है।

इसी नींव पर रिपोर्ट का सबसे बड़ा अनुमान खड़ा है। आज भारत का रियल एस्टेट बाजार करीब 613 अरब डॉलर का है, जिसमें महानगरों के बाहर का हिस्सा सिर्फ 15% यानी करीब 92 अरब डॉलर है। 2047 तक यह बाजार 5.8 ट्रिलियन डॉलर का हो सकता है, और अगर उसमें छोटे शहरों का हिस्सा 25 से 30% हुआ, तो उनका बाजार 1.4 से 1.74 ट्रिलियन डॉलर का होगा। यानी आज से 15 से 19 गुना बड़ा।

जश्न से पहले तीन कड़वे सच

पहला सच यह है कि यह पूरा अनुमान शर्तों पर टिका है। नाइट फ्रैंक इंडिया के सीएमडी शिशिर बैजल खुद लिखते हैं कि जहां निर्माण बिक्री से आगे निकल जाता है, वहां नतीजा समृद्धि नहीं, खाली पड़े मकान होते हैं। 25% तक पहुंचने के लिए घरों और गोदामों का फैलाव काफी है, लेकिन 30% के लिए दफ्तर और रोजगार भी इन शहरों तक आने चाहिए।

दूसरा सच यह है कि यह लहर हर शहर और हर गली तक नहीं पहुंचेगी। रिपोर्ट साफ कहती है कि अगला दौर उन्हीं इलाकों में आएगा जहां कनेक्टिविटी सच में नौकरियों में बदलती है। रिपोर्ट में छोटे शहरों के भाव प्रॉपर्टी लिस्टिंग और बाजार सर्वे से लिए गए हैं, रजिस्ट्री के असली सौदों से नहीं। 63% की बढ़त बीते कल का आंकड़ा है, आने वाले कल की गारंटी नहीं।

तीसरा सच सबसे असहज है। अगर हमारे शहरों में कीमतें इसी रफ्तार से बढ़ती रहीं, तो क्या दस साल बाद इंदौर का आम परिवार भी उसी मुश्किल में होगा जिसमें आज मुंबई का परिवार है? महानगरों ने दिखा दिया है कि जब योजना कमाई और घरों के बीच संतुलन नहीं रखती, तो मध्यम वर्ग धीरे धीरे अपने ही शहर से बाहर धकेल दिया जाता है।

इसलिए अगर आप घर या जमीन खरीदने की सोच रहे हैं, तो उत्साह से पहले पांच सवाल पूछिए। क्या उस इलाके में सच में नौकरियां आ रही हैं? क्या सड़क, मेट्रो या एयरपोर्ट जमीन पर बन चुका है, या सिर्फ घोषणा हुई है? क्या पानी, बिजली और सीवरेज भरोसेमंद हैं? क्या कागजात और टाइटल साफ हैं? और क्या प्रोजेक्ट RERA में रजिस्टर्ड है? छोटे शहरों में सबसे बड़ा जोखिम अक्सर कीमत का नहीं, भरोसे का होता है।

असली सवाल: हम कैसा शहर बनाना चाहते हैं?

इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहा कि किस शहर में कीमतें कितनी बढ़ेंगी। सवाल यह है कि हम कैसा शहर बनाना चाहते हैं।

घर की कीमत किसी शहर की सेहत का थर्मामीटर है, उसकी दवा नहीं। थर्मामीटर का पारा चढ़ना अच्छी खबर तभी है जब शरीर सच में मजबूत हो रहा हो। अगर कीमतें रोजगार और कमाई के साथ बढ़ें, तो वह समृद्धि है। अगर कीमतें कमाई से आगे भागें, तो वह बुखार है। हमारे छोटे शहरों के पास आज वह मौका है जो महानगरों के पास तीस साल पहले था: गलतियां होने से पहले उन्हें रोकने का।

इस मौके को सही दिशा देने की जिम्मेदारी तीन स्तरों पर है। पहली जिम्मेदारी सरकार की है। रिपोर्ट खुद एक स्पष्ट एजेंडा देती है। रोजगार और ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के आसपास ऐसी जमीनों की सूची सार्वजनिक हो जिनमें सुविधाएं पहुंच चुकी हों और टाइटल साफ हो। मंजूरियों और बिजली पानी के कनेक्शन की समय सीमा तय हो। उद्योगों के साथ कामगारों के लिए किराए के घरों की योजना भी बने। और सबसे अहम, सफलता को इस बात से न नापा जाए कि कितने प्रोजेक्ट पूरे हुए, बल्कि इससे नापा जाए कि उनसे कितनी नौकरियां, कितने घर और कितना निजी निवेश पैदा हुआ। मध्य प्रदेश के लिए यह एक तैयार कार्य सूची है।

दूसरी जिम्मेदारी उद्योग और निर्माण से जुड़े लोगों की है। उन्हें असली मांग के लिए बनाना होगा, सट्टे के लिए नहीं। हर आय वर्ग के लिए घर बनाने होंगे, सिर्फ करोड़ों के फ्लैट नहीं। महानगरों में किफायती घरों का गायब होना बाजार की विफलता है, और हमें उसे अपने शहरों में दोहराने से बचना होगा।

तीसरी जिम्मेदारी हम नागरिकों और खरीदारों की है। धैर्य रखना, जांच परखकर खरीदना, और अफवाह या घोषणा के बजाय जमीन पर दिख रहे बदलाव पर भरोसा करना। शहर सिर्फ सरकार नहीं बनाती। शहर उसके लोगों की समझदारी से बनता है।

शिशिर बैजल की एक बात मुझे इस पूरी रिपोर्ट का सार लगती है। अवसर महानगरों की नकल छोटे शहरों में करने का नहीं है, बल्कि ऐसे शहर बनाने का है जो अपनी खास ताकत के दम पर आगे बढ़ें। इंदौर को मुंबई बनने की जरूरत नहीं है। इंदौर को बेहतर इंदौर बनना है। ऐसा शहर जहां एक स्कूल शिक्षक, एक नर्स और एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, तीनों अपने काम के पास सम्मान से रह सकें।

अगर हम यह कर पाए, तो वह स्टेशन वाला दृश्य भी बदल जाएगा। तब प्लेटफॉर्म पर खड़े माता पिता अपने बच्चों को विदा नहीं करेंगे, बल्कि दूर के शहरों से लौटते बच्चों का स्वागत करेंगे। तरक्की के लिए घर छोड़ना मजबूरी नहीं रहेगी, एक विकल्प भर रह जाएगी।

भारत की अगली कहानी महानगरों के बाहर लिखी जा रही है। उस कहानी का अंत कैसा होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि हम आज अपने शहरों को कितनी समझदारी से गढ़ते हैं।

#IndoreSeyBharatTak

Founder and CEO of Micro Mitti Manoj Dhanotiya
Manoj Dhanotiya Founder of Micro Mitti

Founder and CEO of Micro Mitti

Manoj Dhanotiya is a serial entrepreneur, PropTech innovator, and Founder & CEO of Micro Mitti, India's first co-investment-led PropTech platform.
With over 15 years of experience across technology, SaaS, and real estate, he previously built AiTrillion into a global SaaS platform serving 15,000+ clients in 100+ countries. Recognised with the Economic Times Entrepreneur Award, Times Achievers Award, Realty+ PropTech 40 Under 40, and Madhya Pradesh's "Captains of Industry"  awarded and honoured by Chief Minister Dr. Mohan Yadav.
Driven by the belief that real estate should be accessible to all he advocates on financial literacy and democratized real estate investing. A sought-after speaker and mentor, Manoj is committed to empowering students and entrepreneurs, advancing Bharat-first innovation, and creating accessible pathways to long-term wealth creation.